Monday, April 14, 2008

इतना कठिन तो नही था

इतना कठिन तो नही था. था काफ़ी आसान. इतना आसन की होता नही था. होने के लिए कुछ है भी नही. सत्य का होने से क्या लेना देना. शुरू मे मैंभी काफ़ी भटका. क्या क्या नही किया. कहाँ कहाँ नही गए. कौन कौन से शास्त्र नही पढ़ा. किस किस साधू महात्मा से नही मिले . की कोई सत्य का दर्शन करा दे. की कोई अस्तित्व से वापस जोर दे. की कोई बुद्धत्व को उपलब्ध कर दे. जितने से मिला उसने वही कहा की ये करो , वो करो , प्राणायाम करो , ध्यान करो. लेकिन करो जरुर. करना इतना जादा महत्वपूर्ण हो गया की सत्य की अभिव्यक्ति भी करने से होने लगी. मेरे दोस्त मुझे फ़ोन कर के पूछते हैं - की क्या कर रहे हो? मेरे लिए इस से गन्दा सवाल कुछ भी हो नही सकता है. इस से जादा गन्दा सवाल पूछना मुश्किल है. क्या करेंगे यार. किसने क्या किया ? आजतक किसी ने कुछ भी नही किया है सब पहले से ही किया हुआ है. तुम जबरदस्ती कर कर के अस्तित्व से सुन्दरतम स्वरूप को दूषित कर देते हो. तुम जो भी कर रहे हो उसके बरे मे तुम्हे कुछ भी नही पता है. तुम वो कर रहे हो जो किया नही जा सकता है. इसलिए तो संसार मे इतना कष्ट और दुःख है. बुध का पहला वचन था की संसार मे कष्ट है. बुद्ध राजकुमार थे. जब एक राजकुमार को कष्ट हो सकता है, तो फिर मैं क्या हूँ. कष्ट इसलिए है क्यों की अव्यक्त से व्यक्त की घटना मे थोरी कमी रह गई थी. नही तो अमृत की सरिता बह सकती थी. हीरे मोटी के पहार हो सकते थे. अरबों खरबों बुद्ध जैसे आदमी पैदा हो सकती थे. अनसूया जैसी पतिव्रता नारियाँ हो सकती थी. अव्यक्त ठीक से व्यक्त मे परिवर्तित न हो सका. हजारों साल मे १-२ बुद्ध पैदा हों उस से क्या होगा. एक बुद्ध काफी नही है पुरी मानवता के लिए. एक बुद्ध कितना करेगा. जितने वो कर सकते थे किए. काफी किए. जिनको लेना थे लिया. वैसे बुद्धत्व की स्थिति मे पहुचने के बाद करने के लिए कुछ bachta नही है. ये तो बुद्ध ka बरप्पन है की वो सम्बोधि की घटना के बाद भी लोगों के लए बोले.
वस्तुतः स्थिति कुछ ऐसी है - जैसे मान लो एक राजा को स्मृति खो जाए और वह भूल ही जाए की वह राजा है और वह यह मान ले की वह रंक है. हमारी स्थिकी बिल्कुल ऐसी ही है हम वस्तुतः बुद्ध है क्योंकि अस्तित्व हर जगह बराबर है. सब अस्तित्व मे समाया हुआ है. अब अस्तित्व बुद्ध का हो या तुम्हारा इस से अस्तित्व को कोई फर्क नही परता. अस्तित्व शुद्धतम है. हमेशा से था समय से भी पहले. और हमेशा रहेगा. इस बात को समझने के लिए थोरा से विवेक चाहिए. थोरा ही काफ़ी है जादा विवेक अहंकार पैदा करेगा. हम बुद्ध नही है, यह मान्यता है. सत्य नही है. अगर मान्यता गिर जाए तो सत्य प्रकट हो जाएगा. इसलिए मान्यता छोर दो. सत्य को तुम्हारी ओर प्रवाहित होने दो. तुम्हारी मान्यता सत्य के प्रवाह को रोक देती है. इस से सत्य का तो कुछ नही बिगड़ता है, पता तुम्हारा सबकुछ बिगार जाता है. सत्य की प्रवाह अत्यन्त ही सूक्ष्म और शीतल है. मंद मंद प्रवाह है जिसे तुम्हारी शिला रुपी मान्यता रोक देती है. वही मान्यता जब प्रगाढ़ हो जाती है तो वो अहंकार का रूप धारण कर लेती है. फिर अहंकार करता भाव पैदा करता है की -I am the doer. फिर यही करता भाव ले doobta hai. Jahan करता है wahan सत्य नही हो sakta. Wahan तो संसार है
इसलिए अगर तुम मान्यता छोर दो, तो तुम्हे सत्य प्रकट होगा. दुःख है नही, दुःख मान्यता का है. हमने मान लियाकी दुःख है, इसलिए दुःख है. दुःख वस्तुतः नही है. वस्तुतः सुख भी नही है. सत्य सुख और दुःख के ऊपर है
क्योंकि अव्यक्त मे कोई सुख दुःख के लिए कोई जगह नही है तो व्यक्त मे सुख दुःख कैसे होगा.

1 comment:

Anonymous said...

I read this post but couldn't get proper time to comment. Thoda busy schedule hai till next week, aft that will be able to write more comments. But, I read regularly. :-)