जीवन दुःख है। बुद्ध ने ठीक कहा था। बुद्ध का पहला वचन था की जीवन दुःख है। ठीक कहा था उन्होंने। कुछ भी करो उसका अन्तिम परिणाम दुःख होता है। ये संसार दुःख सागर है। दुःख सागर कहना भी कम परेगा। दुःख का ऐसा सागर जिसकी गहराई अनंत है। मैंने इसे अनुभव किया है। करते ही दुःख हो जाता है। कुछ भी शाश्वत नही है यहाँ । लेहमन ब्रोदर डूब गया। कोई नही बचा पाया। सारा एम्.बी.ऐ का ज्ञान धरा का धरा रह गया और डूब गया। बनाया गया था इसलिए डूबा, अगर नही बनाया जाता तो नही डूबता। यह जीवन बना है, इसलिए डूबेगा। जो बनता है डूब जाता है। देर सबेर डूब ही जाता है। जिसे प्रेम करो उसी से अप्रेम हो जाता है। पर दुःख मान्यता का ही है। अगर दुःख का कारण है तो उसे समाप्त किया जा सकता है। अगर दुःख का कारन न हो तो उसे समाप्त नही किया जा सकता है। फिर दुःख शाश्वत हो जाएगा। और अगर दुःख शाश्वत हो जाए तो दुःख दुःख न रहेगा, फिर दुःख ही सत्य हो जाएगा। पर जिन जिन लोगों ने जीवन को बहोत ही गहराई से परखा है उनका यही कहना है की दुःख शाध्वत नही है। उन्होनों सुख की शाश्वत किरण को देखा होगा। एक किरण काफ़ी है। अगर तुम्हे सुख की एक भी किरण दिखाई परने लगे तो वो तुम्हे अनंत तक ले जा सकता है। जैसे की तुम अगर सूर्य की एक भी किरण को पकर लो तो वो तुम्हे सूर्य तक पंहुचा सकता है। पर उस किरण को समझने के लिए थोरा सा ज्ञान चाहिए। ज्ञान मे वो शक्ति है जो कर्म के बंधन से मुक्ति दिला सके। इसलिए मैंने ज्ञान को सर्वोपरि माना है। हालाँकि, कलयुग मे मंत्र योग की ही गाथा गाई गयी है। चैतन्य महाप्रभु इसके बहोत बारे समर्थक रहे हैं। क्योंकि कलयुग का आदमी दीन हीन होता है। उस से हठयोग जैसे कठिन साधना सम्भव नही हो सकेगी। इसलिए मंत्र योग का प्रावधान है कलयुग मे। पर इसका मतलब यह नही है की लोग मंत्र योग के अतिरिक्त कोई और योग न करे। अबतक एक मेरे अनुभव के अनुसार मैंने ज्ञान योग को ही सर्वोपरि माना है। मेरा मानना ग़लत भी हो सकता है। या ऐसे कहे की मेरे लिए ज्ञान योग सरलतम मार्ग है। किसी और के लिए भक्ति मार्ग सरल हो सकता है, किसी की लिए हठयोग सरल हो सकता है। मार्ग कुछ भी हो, पर अन्तिम परिणाम मुक्ति है। हम वस्तुतः इस शरीर मे कैद हैं। यह शरीर जेल जैसा है। धयान के माध्यम से इस शरीर के बहार निकला जा सकता है। ध्यान तुम्हे अनंत तक ले जा सकता है। खुले आकाश मे विचरण करा सकता है। आकाश के बारे मे मे दो शब्द कहना चाहता था। सबसे पहले आकाश का निर्माण हुआ था। खुला आकाश। इसलिए आकाश को मात्र देखने मात्र से ब्रह्म की अनुभूति होती है। इसलिए हम इश्वर को जब भी याद करते हैं तो आकाश की तरफ़ देखते हैं। जीसस को तुमने देखा होगा आकाश की तरफ़ देखते हुए। आकाश ब्रह्म का शुद्धतम रूप है। एक समय था जब हम न थे, आकाश था। एक समय होगा जब हम न रहेंगे, आकाश रहेगा। आकाश से मेरा बचपन से ही लगाव रहा है। बचपन मे अपने गाँव मे रात मे छत पर सोने समय खुले आकाशे मे चाँद तारों को देख कर आनंदित हुआ करता था। आकाश ने मुझे अब बचपन से ही आकर्षित किया है। खासकर क्षितिज ने।
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Sunday, October 12, 2008
Friday, September 19, 2008
शब्द और सत्य
मैंने अबतक सत्य के बारे मे जो कुछ भी लिखा, वो सत्य नही था। वो सत्य के बारे मे जानकारी थी। सत्य को नही लिखा जा सकता है, कभी नही लिखा गया, कभी किसी ने नही लिखा। पर हाँ सत्य के बारे मे लिखा जा सकता है। सत्य को नही लिखा गया है, सत्य के बारे मे थोरा बहोत लिखा गया है। पर हम समझ लेते हैं की सत्य ही लिखा गया है। शब्द सत्य को नही व्यक्त कर सकता है। अगर सत्य शब्द मे व्यक्त हो जाए तो शब्द सत्य हो जाएगा। फिर सत्य, सत्य na रहेगा। शब्द की सीमा होती है, सत्य की कोई सीमा नही। शब्द की उत्पत्ति होती है। सत्य की कभी उत्पत्ति होती नही। शब्द का कारण है। सत्य का कोई करना नही है। बस है। मनुष्य जाती के इतिहास मे सत्य के बारे मे जो कुछ भी लिखा गया है और जो लिखा जाएगा वो पूर्ण सत्य के सापेक्ष कुछ भी नही है। रत्ती भर भी सत्य नही लिख गया है। सत्य शब्द मे उतरता नही। क्योंकि, सत्य की अनुभूति अपूर्व है। बहोत कम लोगों ने वैसी अनुभूति की है और उनलोगों ने उस अनुभूति को व्यक्त करने के लिए नए शब्द का निर्माण नही किया। क्योंकि निर्माण करने के लिए इच्छा टी होनी चाहिए। पूर्ण सत्य के समय साड़ी इच्छाएं विसर्जित हो जाती हैं। इसलिए सत्य को ठीक ठीक व्यक्त करने वाले शब्द के निर्माण न हो सका। क्योनी जिनको सत्य मिला we सत्य मे ही लीं रहे। तो जिनको सत्य मिला वे सत्य के लिए शब्द नही बना सके। और जिन्होंने शब्द को बनाया उनको सत्य तो मिला नही, तो वे भी सत्य के लिए शब्द न बना सके। दोनों ही न बना सके। न सत्यदर्शी न शब्ददर्शी। सत्य मे शब्द के लिए जगह नही है। इतनी जगह नही है की शब्द wahan ठहरे। इसलिए बुद्ध भी सत्य के बारे मे जादा कुछ बोले नही। बुद्ध बोलें तो कैसे। सत्य शब्द मे उतरता नही है। अगर तुम बद्ध से पूछो की सत्य क्या है। तो वो कुछ नही बोलेंगे। मौन रहेंगे वो। क्योंकि शब्द का प्रोयाग करते ही सत्य सत्य न रहेगा। किसी भी शब्द मे, किसी भी वाक्य मे इतना सामर्थ्य नही है की वो सत्य का निरूपण कर सके। हमारे पास जीवन की हर एक अनुभूति के लिए शब्द नही हैं। कुछ अनुभूति ऐसी हैं जो बहोत कम लोगों को हुआ है। किसी बुद्ध किसी महावीर किसी जीसस को हुआ। तो उन्होंने शब्द तो बनाया नही। वो कोई कवि या लेखक तो थे नही की शब्द मे उनकी रूचि हो। थोरा बहोत बताये। पूर्ण तो वो भी नही बता सके। बताने की भी एक सीमा होती है। जितना उनसे बन सका वो बताये। हम माने या न माने, पर वो बताये। घूम घूम के बताये। अस्तांगिक मार्ग बताये। शब्द उतना महत्वपूर्ण नही है. शब्द धूल की तरह है। जब घोर्रे दौरते हैं तो धूल उरने लगती हैं। वैसे ही जब सत्य किसी के ह्रदय मे प्रकट होता है तो शब्द बनने लगते है, फिर वेदा, उपनिषद बनने लगते हैं। फिर धर्म बनने लगते हैं।
Saturday, June 7, 2008
ज्ञान प्रेम और सत्य
ज्ञान अकेला नीरस है। जबतक उसमे प्रेम के फूल न खिले टू उसे व्यर्थ जानना। ज्ञान मन की अभिव्यक्ति है। प्रेम हृदय की अभिव्यक्ति है। और सत्य पूर्णतः पारमार्थिक है। सत्य, प्रेम और ज्ञान के ऊपर है। जब प्रेम और ज्ञान मिल जायें टू सत्य उपलब्ध हो सकता है। मन चंचल है। इसलिए ज्ञान भी स्थिर नही रहता। हृदय थोरा स्थिर रहता है। इसलिए प्रेम मे थोरा स्थायित्व रहता है। शुद्ध प्रेम स्थायी होगा। पर जो प्रेम ज्ञान के आधार पर टिका हो, जो विश्लेषण के आधार पर टिका हो, जो शर्तों के आधार पर टिका हो वो प्रेम स्थायी नही होगा। वो प्रेम होगा ही नही। वो कुछ और होगा। वह विवाह होगा। कोई भी नाम दे दो। अगर विवाह मे प्रेम की थोरी भी संभावना होती टू अब तक अरबों खरबों बुद्ध जैसे आदमी पैदा हो सकते थे। क्योंकि अरबों खरबों विवाहें हुईं हैं। पर थोरी संभावना टू है। की विवाह के माध्यम से प्रेम को जाना जाए। विवाह एक सामजिक व्यवस्था है। शायद समाज ने प्रेम को समझने के लिए विवाह का ईजाद किया हो। सत्य के मार्ग मे प्रेम और ज्ञान दोनों बाधाएं हैं। क्योंकि दोनों ही अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति सत्य का दर्शन नही कराती। पर प्रेम उतनी बरी बाधा नही है जितना बरी बाधा ज्ञान है। प्रेम टू सत्य के काफी निकट है, पर सत्य नही है। ज्ञान बहुत बरी बाधा है। तुम्हारी ९९% से भी ज्यादा अभियक्ति पूर्णतः मानसिक होती है। क्योंकि आज का समाज पूर्णतः मानसिक हो गया है है। प्रेम भी मानसिक हो गया है। मानसिक प्रेम । तुम जिसे प्रेम करोगे उसे अपने मन के तल पर तौल के देखो को वो खरा उतरता है या नही। तुम प्रेम का विश्लेषण करो। पहले ऐसा नही होता था। पहले सिर्फ़ शुद्ध प्रेम होता है। वहाँ विश्लेषण के लिए कोई जगह नही होती थी। टू फिर लैला और मजनू जैसी जोड़ी पैदा होती थी। क्योंकि उनका प्रेम पूर्णतः ह्रदय के तल पर है। वहाँ मन के लिए कोई जगह नही है। मैं जो ये लेख लिख रहा हूँ, यह भी मानसिक है। मन के माध्यम से ह्रदय को व्यक्त करने की कोशिश करे रहा हूँ। ऐसा हो सकता है। मन ह्रदय की अभिव्यक्ति को शब्द मे ढालने मे सक्षम है। कवि लोग यही टू करते हैं। पर ह्रदय मन की अभिव्यक्ति क प्रकट नही कर सकता। इसलिय कभी कभी यह समझ पाना की कविता मन के तल से लिखी गई है या वस्तुतः ह्रदय से लिखी गई है मुश्किल हो जाता है।
थोरा सा ज्ञान काफी है। बस इतना ज्ञान हो जाए की ज्ञान व्यर्थ है काफ़ी होगा। सारा ज्ञान टू यही कहता है की ज्ञान व्यर्थ है। समझने वाले समझ लेते हैं। बुद्ध, महावीर समझ गए थे। हो सकता है तुम न समझ पाओ। पात्रता चाहिए। थोरी पात्रता चाहिए। पानी १०० डिग्री पर ही उबलता है। वस्तुतः पात्रता भी नही चाहिए। वस्तुतः कुछ भी नही चाहिए। पर यह बात अति-पारमार्थिक हो जाती है। इसलिए तुम समझ नही पाते। पर पात्रता तुम समझ लोगे। की पात्रता है या नही। इसलिए टू जादातर योग का आधार पात्रता है। अष्टावक्र के योग का आधार पात्रता नही है। उनके नजर मे सबकी पात्रता बराबर है। उनका आधार अस्तित्व है। अस्तित्व मे कुछ भी छोटा या बरा नही होता। अस्तित्व हर जगह बराबर है। बस इतना ही समझ लेना काफ़ी है। इससे जादा कुछ है भी नही समझने के लिए। यही सत्य है।
Tuesday, May 20, 2008
मृत्यु - एक शाश्वत satya
मृत्यु एक शाश्वत सत्य है। एक अटल सत्य। जिसे कोई नही ताल सकता। पर मृत्यु शरीर की होती है। आत्मा अमर है - जैसा की श्री कृष्ण ने गीता मे कहा। जिसने आत्मा क जान लिए वो कभी नही मर सकता। ये शरीर एक दिन मिटटी मे मिलेगा और हमे पता है की मिटटी मे मिलेगा। फिर हम ऐसे जीवन व्यतीत करते हैं जैसे की हम अमर हों। यह संसार का सबसे बार आश्चर्य है। जैसे की युधिश्तिर ने कहा था यक्ष को। उसने थिक कहा था। मृत्यु इस जीवन की सबसे बरी विडम्बना है। उसे दिन सब कुछ खत्म हो जता है। सरे बुने सपने मिटटी मे मिल जाते हैं। रत्ती भर भी टू नही बचा पते। सब मिट जाता है। सारा अहंकार गिर जाता है उस दिन। सारे सगे सम्बन्धी छूट जाते हैं। वस्तुतः वे कभी थे ही नही। इसलिए टू छूटते हैं। परिवार एक सामाजिक व्यवस्था है। इस से जादा कुछ भी नही है। तुम कितना भी अपने माँ बाप को प्रेम करो पर उस दिन कोई काम न आयेगा। तुम अकेले ही जाओगे। इस अनंत जीवन मे तुम अकेले यात्री हो। कोई किसी को बाँध के नही रखता। सब की अपनी अपनी यात्रा है। अपनी अपनी डगर है। मेरा बाबा मेरे पापा को छोर के चले गए। कुछ दिन रोये होंगे। फिर भी जीवन टू उनका चाल ही रहा है। और चलेगा। क्योंकि जीवन अकेला है। इसमे कुछ सगे सम्बंदी कुछ समय के लिए तुम्हारे हमसाठी बन जाते हैं। फिर तुम उसे पाकर के मत बैठ जाना। जैसा की तुम हमेशा से करते आये हो। इस पूरे संसार मे पकरने के लिए कुछ भी नही है। तुम यहाँ से रत्ती भर भी नही ले जा पाओगे। तुम यहाँ से एक मिटटी का एक कण भी नही ले जा पाओगे। सब छूट जाएगा उस दिन। मृत्यु जीवन का एक पराव है। इसलिए मई कहता हूँ की सत्य को समझो। आत्मा को जानो। जीसी जानने का बाद कुछ जानने के लिए नही बचता है। फिर तुम्हे मृत्यु से डर नही लगेगा। तुम मृत्यु का हस कर स्वागत करोगे।
मृत्ये हमेशा शरीर की होती है। चैतन्य की कभी मृत्यु नही होती है। वह शाश्वत है। हमेश से था। जब तुम न थे पर वो था। आज से बस २०-५० साल पहले तुम्हारे शरीर का कोई अस्तित्व न था। पर चैतन्य हमेशा से था। उस निराकार अविनाशी पर परात पर ब्रह्म को पहचानो। जिस से इस सारे जगत की उत्पति हुई है। ये किताब को छोरो। वो तुम्हे ले डूबेगा। क्योंकि लिखने वाले को ख़ुद कुछ नही पता की उसने क्या लिखा है। उसने जल्दी मे लिखा है। उसे धन कमाने ही होर लगी है। वो तुम्हे सत्य नही दे सकता। किताबों मे सत्य नही छिपा है मेरे भाई। सत्य तुम्हारे अन्दर है। किताब तुम्हे सत्य से दूर जरूर ले जा सकता है।
उस साक्षी को पहचानो जो घाट घाट मे विद्यमान है। वही साक्षी टू बुद्ध, महावीर और जीसस के पास था। उसे पकारो। buuddh एक मृत का शरीर देखे और सब छोर के चले गए थे। क्यों? इसके पीछे कारन है। एक आदमी मारा की सारी मनुष्यता मर गई। बुद्ध के पास परिपक्वा चैतन्य था। उन्हें पुनि मनुष्यता दिखाई परती थी। की एक मारा की सारी मनुष्यता मर गई। इसलिए टू उन्हें ज्ञान प्राप्त कर के भी बहोत दुःख हुआ था। उनका कहाँ था की जबतक धरती का एक एक मानव बुद्ध न बने टू मेरे बुद्ध बनने का कोई प्रयोजन नही। वो थिक कहता थे। एक आध आदमी मे सत्य प्रकट हो और सारी मनुष्यता सत्य के लिए लालायित रहे, टू इसका क्या परिणाम होगा। बद्ध को भी पूर्ण ज्ञान नही मिला था। हालांकि बुद्ध सारी अकन्षाओं के बाहर चले गए थे। ऐसा कभी अभी होता है। अरबों खरबों आदमी मे कोई एक बुद्ध पैदा होता है जो सारी आकाँक्षाओं के बाहर चला जाता है। जिसके सारे अहंकार गिर जाते हैं। रत्ती भर भी अहंकार नही रहता उनका। बस शुद्ध अस्तिव होता है उनके पास। वो मन और बुद्धि के बाहर होते है।
बुद्ध को ज्ञान मिला और तुम्हे नही मिला। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब ये है की सत्य ख़ुद पूर्ण रूप से प्रकट नही हुआ। वो सिर्फ़ बुद्ध मे प्रकट हुआ। शुद्दोधन मे कहाँ प्रकट हुआ। इसलिए टू बुद्ध दुःखी हो गए थे। वो ये सोचे की ज्ञान मुझे मिला पर मई टू रहा नही। फिर ज्ञान का क्या प्रयोजन। इन्हे टू मिला नही। मेरा ही ज्ञान मेरे को ही मिलके क्या प्रयोजन? इसलिए टू बुद्ध तुम्हारे लिए थोरा बहोत बोले। की तुम्हे ज्ञान मिले। तुम भी बुद्धत्व को प्राप्त कर सको।
मानव जाती तभी सुखी होगी जब एक एक मानव सुखी हो। अगर एक भी मानव दुखी है टू सारी मनुष्यता दुखी है। क्योंकि वो मानव मनुष्यता की ही हिस्सा है। उसके अन्दर भी वही चैतन्य है जो बुद्ध के अन्दर था। तुम्हारी मूर्खता सत्य पर भी प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। वो बुद्ध पर भी प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। फिर तुम पूछोगे की सत्य का क्या उपयोग है। ये २०वीं सदी उपयोग्वादिता का युग है। हर चीज का उपयोग होना चाहिय। बात थिक भी नही। पर अस्तित्व का उपयोग नही हो सकता है। क्योंकि सब उसे समाया हुआ है।
मृत्ये हमेशा शरीर की होती है। चैतन्य की कभी मृत्यु नही होती है। वह शाश्वत है। हमेश से था। जब तुम न थे पर वो था। आज से बस २०-५० साल पहले तुम्हारे शरीर का कोई अस्तित्व न था। पर चैतन्य हमेशा से था। उस निराकार अविनाशी पर परात पर ब्रह्म को पहचानो। जिस से इस सारे जगत की उत्पति हुई है। ये किताब को छोरो। वो तुम्हे ले डूबेगा। क्योंकि लिखने वाले को ख़ुद कुछ नही पता की उसने क्या लिखा है। उसने जल्दी मे लिखा है। उसे धन कमाने ही होर लगी है। वो तुम्हे सत्य नही दे सकता। किताबों मे सत्य नही छिपा है मेरे भाई। सत्य तुम्हारे अन्दर है। किताब तुम्हे सत्य से दूर जरूर ले जा सकता है।
उस साक्षी को पहचानो जो घाट घाट मे विद्यमान है। वही साक्षी टू बुद्ध, महावीर और जीसस के पास था। उसे पकारो। buuddh एक मृत का शरीर देखे और सब छोर के चले गए थे। क्यों? इसके पीछे कारन है। एक आदमी मारा की सारी मनुष्यता मर गई। बुद्ध के पास परिपक्वा चैतन्य था। उन्हें पुनि मनुष्यता दिखाई परती थी। की एक मारा की सारी मनुष्यता मर गई। इसलिए टू उन्हें ज्ञान प्राप्त कर के भी बहोत दुःख हुआ था। उनका कहाँ था की जबतक धरती का एक एक मानव बुद्ध न बने टू मेरे बुद्ध बनने का कोई प्रयोजन नही। वो थिक कहता थे। एक आध आदमी मे सत्य प्रकट हो और सारी मनुष्यता सत्य के लिए लालायित रहे, टू इसका क्या परिणाम होगा। बद्ध को भी पूर्ण ज्ञान नही मिला था। हालांकि बुद्ध सारी अकन्षाओं के बाहर चले गए थे। ऐसा कभी अभी होता है। अरबों खरबों आदमी मे कोई एक बुद्ध पैदा होता है जो सारी आकाँक्षाओं के बाहर चला जाता है। जिसके सारे अहंकार गिर जाते हैं। रत्ती भर भी अहंकार नही रहता उनका। बस शुद्ध अस्तिव होता है उनके पास। वो मन और बुद्धि के बाहर होते है।
बुद्ध को ज्ञान मिला और तुम्हे नही मिला। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब ये है की सत्य ख़ुद पूर्ण रूप से प्रकट नही हुआ। वो सिर्फ़ बुद्ध मे प्रकट हुआ। शुद्दोधन मे कहाँ प्रकट हुआ। इसलिए टू बुद्ध दुःखी हो गए थे। वो ये सोचे की ज्ञान मुझे मिला पर मई टू रहा नही। फिर ज्ञान का क्या प्रयोजन। इन्हे टू मिला नही। मेरा ही ज्ञान मेरे को ही मिलके क्या प्रयोजन? इसलिए टू बुद्ध तुम्हारे लिए थोरा बहोत बोले। की तुम्हे ज्ञान मिले। तुम भी बुद्धत्व को प्राप्त कर सको।
मानव जाती तभी सुखी होगी जब एक एक मानव सुखी हो। अगर एक भी मानव दुखी है टू सारी मनुष्यता दुखी है। क्योंकि वो मानव मनुष्यता की ही हिस्सा है। उसके अन्दर भी वही चैतन्य है जो बुद्ध के अन्दर था। तुम्हारी मूर्खता सत्य पर भी प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। वो बुद्ध पर भी प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। फिर तुम पूछोगे की सत्य का क्या उपयोग है। ये २०वीं सदी उपयोग्वादिता का युग है। हर चीज का उपयोग होना चाहिय। बात थिक भी नही। पर अस्तित्व का उपयोग नही हो सकता है। क्योंकि सब उसे समाया हुआ है।
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