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Tuesday, May 20, 2008

मृत्यु - एक शाश्वत satya

मृत्यु एक शाश्वत सत्य है। एक अटल सत्य। जिसे कोई नही ताल सकता। पर मृत्यु शरीर की होती है। आत्मा अमर है - जैसा की श्री कृष्ण ने गीता मे कहा। जिसने आत्मा क जान लिए वो कभी नही मर सकता। ये शरीर एक दिन मिटटी मे मिलेगा और हमे पता है की मिटटी मे मिलेगा। फिर हम ऐसे जीवन व्यतीत करते हैं जैसे की हम अमर हों। यह संसार का सबसे बार आश्चर्य है। जैसे की युधिश्तिर ने कहा था यक्ष को। उसने थिक कहा था। मृत्यु इस जीवन की सबसे बरी विडम्बना है। उसे दिन सब कुछ खत्म हो जता है। सरे बुने सपने मिटटी मे मिल जाते हैं। रत्ती भर भी टू नही बचा पते। सब मिट जाता है। सारा अहंकार गिर जाता है उस दिन। सारे सगे सम्बन्धी छूट जाते हैं। वस्तुतः वे कभी थे ही नही। इसलिए टू छूटते हैं। परिवार एक सामाजिक व्यवस्था है। इस से जादा कुछ भी नही है। तुम कितना भी अपने माँ बाप को प्रेम करो पर उस दिन कोई काम न आयेगा। तुम अकेले ही जाओगे। इस अनंत जीवन मे तुम अकेले यात्री हो। कोई किसी को बाँध के नही रखता। सब की अपनी अपनी यात्रा है। अपनी अपनी डगर है। मेरा बाबा मेरे पापा को छोर के चले गए। कुछ दिन रोये होंगे। फिर भी जीवन टू उनका चाल ही रहा है। और चलेगा। क्योंकि जीवन अकेला है। इसमे कुछ सगे सम्बंदी कुछ समय के लिए तुम्हारे हमसाठी बन जाते हैं। फिर तुम उसे पाकर के मत बैठ जाना। जैसा की तुम हमेशा से करते आये हो। इस पूरे संसार मे पकरने के लिए कुछ भी नही है। तुम यहाँ से रत्ती भर भी नही ले जा पाओगे। तुम यहाँ से एक मिटटी का एक कण भी नही ले जा पाओगे। सब छूट जाएगा उस दिन। मृत्यु जीवन का एक पराव है। इसलिए मई कहता हूँ की सत्य को समझो। आत्मा को जानो। जीसी जानने का बाद कुछ जानने के लिए नही बचता है। फिर तुम्हे मृत्यु से डर नही लगेगा। तुम मृत्यु का हस कर स्वागत करोगे।
मृत्ये हमेशा शरीर की होती है। चैतन्य की कभी मृत्यु नही होती है। वह शाश्वत है। हमेश से था। जब तुम न थे पर वो था। आज से बस २०-५० साल पहले तुम्हारे शरीर का कोई अस्तित्व न था। पर चैतन्य हमेशा से था। उस निराकार अविनाशी पर परात पर ब्रह्म को पहचानो। जिस से इस सारे जगत की उत्पति हुई है। ये किताब को छोरो। वो तुम्हे ले डूबेगा। क्योंकि लिखने वाले को ख़ुद कुछ नही पता की उसने क्या लिखा है। उसने जल्दी मे लिखा है। उसे धन कमाने ही होर लगी है। वो तुम्हे सत्य नही दे सकता। किताबों मे सत्य नही छिपा है मेरे भाई। सत्य तुम्हारे अन्दर है। किताब तुम्हे सत्य से दूर जरूर ले जा सकता है।
उस साक्षी को पहचानो जो घाट घाट मे विद्यमान है। वही साक्षी टू बुद्ध, महावीर और जीसस के पास था। उसे पकारो। buuddh एक मृत का शरीर देखे और सब छोर के चले गए थे। क्यों? इसके पीछे कारन है। एक आदमी मारा की सारी मनुष्यता मर गई। बुद्ध के पास परिपक्वा चैतन्य था। उन्हें पुनि मनुष्यता दिखाई परती थी। की एक मारा की सारी मनुष्यता मर गई। इसलिए टू उन्हें ज्ञान प्राप्त कर के भी बहोत दुःख हुआ था। उनका कहाँ था की जबतक धरती का एक एक मानव बुद्ध न बने टू मेरे बुद्ध बनने का कोई प्रयोजन नही। वो थिक कहता थे। एक आध आदमी मे सत्य प्रकट हो और सारी मनुष्यता सत्य के लिए लालायित रहे, टू इसका क्या परिणाम होगा। बद्ध को भी पूर्ण ज्ञान नही मिला था। हालांकि बुद्ध सारी अकन्षाओं के बाहर चले गए थे। ऐसा कभी अभी होता है। अरबों खरबों आदमी मे कोई एक बुद्ध पैदा होता है जो सारी आकाँक्षाओं के बाहर चला जाता है। जिसके सारे अहंकार गिर जाते हैं। रत्ती भर भी अहंकार नही रहता उनका। बस शुद्ध अस्तिव होता है उनके पास। वो मन और बुद्धि के बाहर होते है।
बुद्ध को ज्ञान मिला और तुम्हे नही मिला। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब ये है की सत्य ख़ुद पूर्ण रूप से प्रकट नही हुआ। वो सिर्फ़ बुद्ध मे प्रकट हुआ। शुद्दोधन मे कहाँ प्रकट हुआ। इसलिए टू बुद्ध दुःखी हो गए थे। वो ये सोचे की ज्ञान मुझे मिला पर मई टू रहा नही। फिर ज्ञान का क्या प्रयोजन। इन्हे टू मिला नही। मेरा ही ज्ञान मेरे को ही मिलके क्या प्रयोजन? इसलिए टू बुद्ध तुम्हारे लिए थोरा बहोत बोले। की तुम्हे ज्ञान मिले। तुम भी बुद्धत्व को प्राप्त कर सको।
मानव जाती तभी सुखी होगी जब एक एक मानव सुखी हो। अगर एक भी मानव दुखी है टू सारी मनुष्यता दुखी है। क्योंकि वो मानव मनुष्यता की ही हिस्सा है। उसके अन्दर भी वही चैतन्य है जो बुद्ध के अन्दर था। तुम्हारी मूर्खता सत्य पर भी प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। वो बुद्ध पर भी प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। फिर तुम पूछोगे की सत्य का क्या उपयोग है। ये २०वीं सदी उपयोग्वादिता का युग है। हर चीज का उपयोग होना चाहिय। बात थिक भी नही। पर अस्तित्व का उपयोग नही हो सकता है। क्योंकि सब उसे समाया हुआ है।