ज्ञान शब्द को हमने ठीक से नही समझा है। ज्ञान का आनुभौतिक अर्थ है मुक्ति। किताबों मे जो ज्ञान हैं वो ज्ञान नही हैं वो सूचनाएँ हैं। वो ज्ञान के बारे मे सूचनाएँ हैं। मुझे आश्चर्य है की ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अरबों खरबों प्रकार की पुस्तकें लिखी गईं। ज्ञान की काफ़ी गहराई मे अज्ञान ही बचता है। हम ज्ञान को पकर लेते हैं। और आजीवन परके रहते हैं। ज्ञान यही कहता है की मुझे पकरो नही। मुक्त रहो। ज्ञान अपने जगह पर है, हम अपने जगह पर हैं। लेकिन कभी कभी हम अपनी अभिव्यक्ति ज्ञान के ऊपर रख देते हैं। इतना ही नही हम यह सोचने लगते हैं की हम ही ज्ञान हैं। ज्ञान सिर्फ़ इतना कहता है की मुझे जानो और छोरो। पकरो नही। समाज मे जब जब अज्ञानी लोगों की संख्या बढती है तो उस समाज मे पुस्तकों की संक्या बढ़ जाती है। पहले तो हम यह समझे की हम सही मे अज्ञानी हैं। हम अज्ञानी हुए कब? हमने कभी कुछ ऐसा तो किया नही की हमारा अज्ञान बढे। हो वही रहा है, हम अज्ञानी नही हैं पर हमने मान लिया है की हम अज्ञानी हैं। अज्ञान मान्यता का है, सत्य नही है। बस मान्यता गिर जाए तो उसी समय अज्ञान ज्ञान हो जाता हैं। किताब पढ़ के जादा कुछ होता नही है, सिर्फ़ हमारी मान्यताएं ही गिरती हैं। और कभी कभी अज्ञान जिसको हमने ज्ञान मन लिया है वो वास्तविक ज्ञान को होने से रोक देता है। ज्ञान ज्ञान को रोक देता है। अज्ञान ज्ञान को रोक देता है। ज्ञान कुछ भी हो उसका मूल अर्थ इतना ही है की ज्ञान अपने जगह पर है। हम अपने जगह पर हैं। हम मे और ज्ञान मे जादा कुछ लेना देना नही है। बस साक्षी भाव का sambandh है। हम ज्ञान के प्रति साक्षी हैं। ज्ञान अपने जगह पे, हम अपने जगह पे और हम ज्ञान के प्रति साक्षी हैं। हम ज्ञान नही हैं। हमें ज्ञान को पकरना नही है। हम जीवन भर उस ज्ञान को पकरते हैं। और जीवन के अन्तिम क्षणों मे हमारा वोही ज्ञान हमारे किसी काम नही आता। सारे ज्ञान विदा हो जाते हैं। विदा की बात तो तब जब हमने उस ज्ञान को पकरा हो। इसलिए हमें दुःख होता है। क्योंकि सारा जीवन तो हमने उस ज्ञान को पकर के बिताया। इसलिए अगर हम ज्ञान को पकरे नही तो ज्ञान के विदा होने का प्रश्न ही नही है। फिर जीवन सुखमय होगा। बस इतना ध्यान रखना की "हम ज्ञान को पकरे नही" यह भी एक प्रकार का ज्ञान है और इसे मत पकर लेना।
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Saturday, December 20, 2008
Wednesday, October 15, 2008
ज्ञान
हमने बहोत सारे ज्ञान खो दिए हैं। समय के गर्त मे खो गया। अब स्थिति ऐसी हो गई है की हमने अज्ञानता को ही ज्ञान मान लिया। और काफ़ी प्रगाढ़ता से माना है। लेकिन पूर्ण प्रगाढ़ता से नही माना है। मेरा मानना है की अगर अज्ञान को भी पूर्ण प्रगाढ़ता से मान लिया जाए तो वह ज्ञान हो जाता है। अज्ञान- को ज्ञान मानकर ज्ञान को भुला दिया| सारा अज्ञान अपूर्णता से उत्त्पन्न होता है। पूर्णता मे अज्ञान कहाँ? पूर्ण, पूर्ण है उसमे अज्ञान की जगह कहाँ? पूर्ण से ही अद्वैत का बोध होता है। अपूर्णता ने तो हमेश द्वैत पैदा किया है। हमें द्वैत दिखाई देता है, अद्वैत दिखाई नही देता। हमने हमेशा से दो देखा है, एक का हमें कुछ भी नही पता। एक को हमने समय की गर्त मे भुला दिया। हमें सीमा दिखाई परती है, असीम हमें दिखाई नही परता। हमें सूरज और चाँद दिखाई परते हैं, उस सूरज और चाँद के बीच जो विराट आकाश है वो हमें दिखाई नही परता। उस आकाश के चलते ही सूरज, चाँद और तारों का अस्तित्व है। अगर आकाश न हो तो ये सारे, सूरज, चाँद खो जायेंगे। अब भी ब्रह्म का काफ़ी हिस्सा व्यक्त नही हुआ है। अभी भी आकाश ही आकाश है। एक परमाणु की अन्दर भी ९९% से जादा हिस्सा मे सिर्फ़ खाली आकाश होता है। हमारे घर के अन्दर भी जादातर स्थान खालि होता है। सूर्य और पृथ्वी के बीच १५ करोर किलोमीटर का खाली आकाश है। मेरे अनुसार अभी भी पूर्ण ब्रह्म के १% हिस्सा भी व्यक्त नही हुआ है। अगर होता, तो सिर्फ़ पदार्थ ही पदार्थ होता। इतना खाली आकाश न होता। पदार्थ ब्रह्म का काफ़ी संघनित रूप है। इसलिए अगर आकाश पे ध्यान किया जाए तो वह काफ़ी प्रभावशाली होगा। हमने ब्रह्म को ॐ की माध्यम से जाना है। ॐ ब्रह्म का सबसे निकटतम प्रतिनिधि है। और शायद आकाश से भी सूक्ष्म है। हम हिन्दुओं ने ॐ की अपरम्पार महिमा गाई है। सारे वेद मंत्र ॐ से ही शुरू होते हैं। और फिर कलयुग मे मंत्र योग का ही प्रावधान है| इसलिए ॐ मंत्र का जाप कलयुग मे कल्याणकारी सिद्ध होगा। कलयुग मे हठयोग , ज्ञानयोग, राजयोग थोरा मुश्किल है।
Saturday, June 7, 2008
ज्ञान प्रेम और सत्य
ज्ञान अकेला नीरस है। जबतक उसमे प्रेम के फूल न खिले टू उसे व्यर्थ जानना। ज्ञान मन की अभिव्यक्ति है। प्रेम हृदय की अभिव्यक्ति है। और सत्य पूर्णतः पारमार्थिक है। सत्य, प्रेम और ज्ञान के ऊपर है। जब प्रेम और ज्ञान मिल जायें टू सत्य उपलब्ध हो सकता है। मन चंचल है। इसलिए ज्ञान भी स्थिर नही रहता। हृदय थोरा स्थिर रहता है। इसलिए प्रेम मे थोरा स्थायित्व रहता है। शुद्ध प्रेम स्थायी होगा। पर जो प्रेम ज्ञान के आधार पर टिका हो, जो विश्लेषण के आधार पर टिका हो, जो शर्तों के आधार पर टिका हो वो प्रेम स्थायी नही होगा। वो प्रेम होगा ही नही। वो कुछ और होगा। वह विवाह होगा। कोई भी नाम दे दो। अगर विवाह मे प्रेम की थोरी भी संभावना होती टू अब तक अरबों खरबों बुद्ध जैसे आदमी पैदा हो सकते थे। क्योंकि अरबों खरबों विवाहें हुईं हैं। पर थोरी संभावना टू है। की विवाह के माध्यम से प्रेम को जाना जाए। विवाह एक सामजिक व्यवस्था है। शायद समाज ने प्रेम को समझने के लिए विवाह का ईजाद किया हो। सत्य के मार्ग मे प्रेम और ज्ञान दोनों बाधाएं हैं। क्योंकि दोनों ही अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति सत्य का दर्शन नही कराती। पर प्रेम उतनी बरी बाधा नही है जितना बरी बाधा ज्ञान है। प्रेम टू सत्य के काफी निकट है, पर सत्य नही है। ज्ञान बहुत बरी बाधा है। तुम्हारी ९९% से भी ज्यादा अभियक्ति पूर्णतः मानसिक होती है। क्योंकि आज का समाज पूर्णतः मानसिक हो गया है है। प्रेम भी मानसिक हो गया है। मानसिक प्रेम । तुम जिसे प्रेम करोगे उसे अपने मन के तल पर तौल के देखो को वो खरा उतरता है या नही। तुम प्रेम का विश्लेषण करो। पहले ऐसा नही होता था। पहले सिर्फ़ शुद्ध प्रेम होता है। वहाँ विश्लेषण के लिए कोई जगह नही होती थी। टू फिर लैला और मजनू जैसी जोड़ी पैदा होती थी। क्योंकि उनका प्रेम पूर्णतः ह्रदय के तल पर है। वहाँ मन के लिए कोई जगह नही है। मैं जो ये लेख लिख रहा हूँ, यह भी मानसिक है। मन के माध्यम से ह्रदय को व्यक्त करने की कोशिश करे रहा हूँ। ऐसा हो सकता है। मन ह्रदय की अभिव्यक्ति को शब्द मे ढालने मे सक्षम है। कवि लोग यही टू करते हैं। पर ह्रदय मन की अभिव्यक्ति क प्रकट नही कर सकता। इसलिय कभी कभी यह समझ पाना की कविता मन के तल से लिखी गई है या वस्तुतः ह्रदय से लिखी गई है मुश्किल हो जाता है।
थोरा सा ज्ञान काफी है। बस इतना ज्ञान हो जाए की ज्ञान व्यर्थ है काफ़ी होगा। सारा ज्ञान टू यही कहता है की ज्ञान व्यर्थ है। समझने वाले समझ लेते हैं। बुद्ध, महावीर समझ गए थे। हो सकता है तुम न समझ पाओ। पात्रता चाहिए। थोरी पात्रता चाहिए। पानी १०० डिग्री पर ही उबलता है। वस्तुतः पात्रता भी नही चाहिए। वस्तुतः कुछ भी नही चाहिए। पर यह बात अति-पारमार्थिक हो जाती है। इसलिए तुम समझ नही पाते। पर पात्रता तुम समझ लोगे। की पात्रता है या नही। इसलिए टू जादातर योग का आधार पात्रता है। अष्टावक्र के योग का आधार पात्रता नही है। उनके नजर मे सबकी पात्रता बराबर है। उनका आधार अस्तित्व है। अस्तित्व मे कुछ भी छोटा या बरा नही होता। अस्तित्व हर जगह बराबर है। बस इतना ही समझ लेना काफ़ी है। इससे जादा कुछ है भी नही समझने के लिए। यही सत्य है।
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