हम सभी आनंद प्राप्त करना चाहते हैं। आनंद प्राप्त करने का मार्ग कुछ भी हो। हमारा उद्देश्य आनंद प्राप्त करना है। प्रेम के सहारे से हम आनंद प्राप्त करते हैं। विवाह का ईजाद भी आनंद प्राप्त करने के लिए किया गया था। अगर विवाह मे आनंद न हो तो कोई विवाह नही करेगा। वस्तुतः आनंद एक मे है। अद्वैत मे ही आनंद हो सकता है। द्वैत ने तो हमेशा से हमें उलझनों मे डाला है। द्वैत मे आनंद की कोई भी सम्भावना नही है। एक होना हमारी गहनतम आकांक्षा है। हम एक होना चाहते है। क्योंकि आनंद एक मे ही है। हम ख़ुद से एक नही हो पाते तो दूसरे से मिलके एक होना चाहते हैं। प्रेम मे वोही होता है। प्रेमी और प्रेमिका एक होने की कोशिश करते हैं। प्रेम अद्वैत की तरफ की यात्रा है। प्रेम की काफ़ी गहराई मे अद्वैत ही बचाता है। यही है प्रेम का वास्तविक सिद्धांत। तो विवाह जो प्रेम का की एक अंग है, उसमे पति पत्नी को अद्वैत की तरफ़ अग्रसर होने की प्रेरणा देती है। हम ख़ुद से एक नही हो पाते, तो प्रेम के माध्यम से एक होना चाहते हैं। जो लोग ख़ुद से एक हो जायें उन्हें फिर विवाह की जरुरत नही है। जैसे की विवेकानंद। उन्होंने विवाह नही किया क्योंकि वो अद्वैत की स्थिति मे थे ही।
2 comments:
Well said! This is an ultimate truth.
hila diya mishra ji ne! from muzaffarpur to kharagpur to banglore.dekh na kahi banglore main earth quake na aa jaye.
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